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इतिहास की भूल का सुधार: नीलाम्बर-पीताम्बर 'भोगता' नहीं, 'खरवार' थे—जानिए क्या कहते हैं दस्तावेज़



झारखंड के महान क्रांतिकारी वीर शहीद नीलाम्बर और पीताम्बर की जातीय पृष्ठभूमि को लेकर लंबे समय से चली आ रही भ्रांतियों को खरवार आदिवासी एकता संघ (झारखंड) ने साक्ष्यों के साथ स्पष्ट कर दिया है। 17 जनवरी, 2026 को किए गए इस शोध ने यह प्रमाणित किया है कि ये दोनों महानायक ‘खरवार आदिवासी’ समुदाय के गौरव हैं।

  1. संवैधानिक और आरक्षण संबंधी अकाट्य तर्क (The Constitutional Proof)
    शोध का सबसे सशक्त पहलू भारत सरकार की आरक्षण नीति और श्रेणियों का विश्लेषण है:
  • खरवार समुदाय की स्थिति: खरवार जाति को झारखंड (तत्कालीन बिहार) में आरंभ से ही अनुसूचित जनजाति (ST) की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया है। शहीद नीलाम्बर-पीताम्बर के वंशजों को दशकों से ‘खरवार’ के रूप में ही आरक्षण और अन्य संवैधानिक लाभ प्राप्त हो रहे हैं।
  • भोक्ता जाति की स्थिति: इसके विपरीत, ‘भोक्ता’ जाति पूर्व में अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में आती थी। केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2022-2023 में संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश (संशोधन) विधेयक के माध्यम से भोक्ता जाति को अनुसूचित जाति (SC) की सूची से हटाकर अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल किया गया है। चूंकि शहीदों के वंशज पीढ़ियों से खरवार (ST) के रूप में अपनी पहचान और लाभ सुरक्षित रखे हुए हैं, इसलिए उन्हें ‘भोक्ता’ जाति से जोड़ना ऐतिहासिक और संवैधानिक रूप से गलत है। भोक्ता जाति का ST में हालिया प्रवेश यह सिद्ध करता है कि दोनों समुदायों की ऐतिहासिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि अलग रही है।
  1. 1908 का खतियान: सर्वोच्च विधिक साक्ष्य
    ब्रिटिश शासन काल के दौरान 1908 ई. का खतियान (C.S. Survey) इस मामले में ‘अंतिम सत्य’ की तरह है:
  • राजस्व रिकॉर्ड: इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ में शहीद नीलाम्बर-पीताम्बर के पोते भूखन खरवार का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है।
  • जाति स्तंभ: रिकॉर्ड के ‘जाति’ कॉलम में स्पष्ट अक्षरों में ‘खरवार’ अंकित है।
  • कानूनी मान्यता: भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार, 100 वर्ष से अधिक पुराने राजस्व अभिलेख (Public Documents) स्वतः ही उनकी मूल पहचान के सर्वोच्च प्रमाण माने जाते हैं।
  1. ‘सनेया’ ग्राम से प्राप्त जमीनी साक्ष्य
    17 जनवरी 2026 को देवनारायण सिंह खरवार और उनके दल ने शहीदों के पैतृक गांव सनेया का दौरा किया:

  • वंशानुगत कड़ी: शहीदों की 7वीं पीढ़ी के वंशज चरकु सिंह और 8वीं पीढ़ी के वंशज विफन सिंह आज भी वहां निवास कर रहे हैं।
  • सामाजिक परंपराएं: उनकी वंशावली और सांस्कृतिक परंपराएं पूरी तरह से खरवार समुदाय की ‘टोटी’ (गोत्र) और रीति-रिवाजों का पालन करती हैं।
  1. ‘भोगता’ शब्द की व्याख्या (Clarification on the Title)
    इतिहास के कुछ स्थानों पर प्रयोग किए गए ‘भोगता’ शब्द का शोध दल ने गहरा विश्लेषण किया है:
  • सम्मानजनक पदवी: पलामू और चेरो रियासत के समय में ‘भोगता’ कोई जाति नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक पदवी या सम्मान था। यह उन योद्धाओं या ग्राम प्रमुखों (गंझू) को दी जाती थी जो सुरक्षा या भू-राजस्व व्यवस्था संभालते थे।
  • भ्रांति का कारण: बाहरी इतिहासकारों ने इस क्षेत्रीय पदवी (Title) को ही उनकी जाति (Caste) समझ लिया, जबकि सरकारी कागजात (खतियान) में उनकी जाति सदैव खरवार ही रही।
  1. सरकार एवं अकादमिक जगत से मांगें
    इस विस्तृत शोध के आधार पर संघ निम्नलिखित मांगें प्रस्तुत करता है:
  • शिक्षा और पाठ्यपुस्तकें: झारखंड शैक्षणिक परिषद (JAC) और अन्य बोर्ड अपनी पुस्तकों में शहीदों के नाम के साथ ‘खरवार’ जाति का उल्लेख अनिवार्य करें।
  • शिलालेखों में सुधार: प्रदेश भर में स्थापित महापुरुषों की प्रतिमाओं के नीचे लगी पट्टिकाओं पर उनकी सही पहचान ‘खरवार’ अंकित की जाए।
  • संग्रहालय संरक्षण: सनेया ग्राम की वंशावली और 1908 के खतियान की प्रतियों को राज्य संग्रहालय में ‘ऐतिहासिक धरोहर’ के रूप में सुरक्षित रखा जाए।

    यह शोध केवल एक सुधार नहीं है, बल्कि झारखंड के गौरवशाली आदिवासी इतिहास को उसकी मूल पहचान वापस दिलाने का महायज्ञ है। अब यह पूर्णतः प्रमाणित है कि नीलाम्बर-पीताम्बर खरवार समाज के अनमोल रत्न थे।
  • शहीद नीलाम्बर पीताम्बर खरवार के वंशजों के खतियान का पूरा भाग देखने के लिए नीचे का वीडियो देखें –

प्रस्तुतकर्ता:
देवनारायण सिंह खरवार (मीडिया प्रभारी)
खरवार आदिवासी एकता संघ, झारखंड

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